सवा दो बरस में अगर कोई कैसे-कैसों को ऐसा-वैसा और ऐसे-वैसों को कैसा-कैसा बना दे तो उसे आप क्या कहेंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार में यह जो चमत्कार कर दिखाया है, वह उनके अशोक रोड के पिछवाड़़े वाले छोटे-से कमरे से निकल कर सवा दो दशक में रेसकोर्स रोड के देश के सबसे महत्वपूर्ण बंगले में पहुंच जाने की करामात से भी सवा सौ गुना बड़ा है। राजनीतिक-पत्रकारिता और पत्रकारीय-राजनीति के मेरे जैसे प्रशिक्षु तो नरेंद्र भाई की कला-दीर्घा में टंगे मूर्त-अमूर्त तैल-चित्रों को आखें फाड़ कर देखने-समझने के अलावा कुछ करने लायक़ ही नहीं बचे हैं।
क्या कोई कल्पना कर सकता है कि दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर भाजपा के केंद्रीय कार्यालय का भूमि-पूजन करते समय हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ के पूर्व-प्रचारक नरेंद्र भाई ने भाजपा और जनसंघ के जिन वीरों की कु़र्बानियों को याद किया था, उनमें से कई भीतर से इतने पोले निकले कि मोदी-युग के सवा दो साल में पूरी तरह ढह गए? आख़िर भाजपा की विजय-गाथा कोई अकेले नरेंद्र भाई ने तो अपने मोर-पंख से लिखी नहीं है। ठीक है कि उन्होंने भी कुछ कु़र्बानियां ली-दी होंगी, लेकिन जनसंघ और भाजपा के 65 साल के संयुक्त-इतिहास में और भी तो होंगे, जिन्होंने उस विचार को मुल्क़ की नसों में फैलाने में अपने हाथ बरसों काले-पीले किए, जिसकी लहरों पर नृत्य करते हुए नरेंद्र भाई आज मेडिसन स्क्वायर तक अपना जलवा बिखेर रहे हैं!
विनायक दामोदर सावरकर, केशव बलिराम हेगडेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलिचंद्र शर्मा, प्रेमनाथ डोंगरा, आचार्य डी.पी. घोष, पीताबंर दास, ए. रामाराव, बछराज व्यास, दीनदयाल उपाध्याय और बलराज मधोक तो चलो अतीत की बात हो गए। इनमें से भी अपने आधा दर्जन पूर्वजों के बारे में आज भाजपा के राष्ट्रवादियों को भी यह नहीं मालूम कि वे थे कौन? लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी तो कल की ही बात हैं। आज वे कहां हैं? दुःखद है कि अटल जी सात साल से देखते हुए भी न देख पाने और समझते हुए भी न समझ पाने की स्थिति में हैं।
मुझे 1990-91 के वे दिन अब भी याद आते हैं, जब अटल जी 5-रायसीना रोड पर रहते थे और अपने निजी-कक्ष में पूरी दीवार पर चस्पा एक तसवीर की बगल में बैठ कर जब-जब अपना दिल खोलते थे, मुझे लगता था कि नेहरू के मानवतावाद की आंच ने उनके ‘हिंदू तन-मन-जीवन’ को जिस सांचे में ढाल दिया था, वही उनकी सबसे बड़ी धरोहर थी। अपनी बेहद मोहक मुस्कान के साथ वे कहा करते थे कि मेरे विरोधी मानते हैं कि मैं आदमी तो सही हूं, लेकिन ग़लत राजनीतिक दल में हूं। मैं यह सोच-सोच कर परेशान हूं कि अटल जी आज अगर ठीक-ठाक होते और सियासत की ख़ुराफ़ाती-मजबूरियां नरेंद्र भाई को तब भी बाज नहीं आने देतीं तो पता नहीं क्या होता!
कुशाभाऊ ठाकरे, के. जना कृष्णमूर्ति और बंगारू लक्ष्मण भाजपा के अध्यक्ष रहे। वे अब संसार में नहीं हैं। होते तो क्या नरेंद्र भाई के ‘हर-रंग बली’ अमित शाह की भाजपा का आंगन इतना टेढ़ा न होता? लेकिन पार्टी के अध्यक्ष रहे आडवाणी और जोशी के अलावा भाजपा के अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह, एम. वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी तो आज भी हैं। सवा दो साल में उन्हें ऐसा क्या हो गया है कि न आडवाणी-जोशी कोई ‘मार्गदर्शन’ कर पा रहे हैं और न राजनाथ की दहाड़ में कोई दम रह गया है। नायडू तो अनुचर बन कर ही फूले नहीं समा रहे। अगर थोड़ी-बहुत धाक है तो गड़करी की, लेकिन इतनी नहीं कि अपनी पार्टी के आंगन को समतल कर सकें।
सुषमा स्वराज और अरुण जेटली भाजपा के अध्यक्ष भले ही नहीं रहे, लेकिन अपने-अपने ज़माने में उनका रुतबा किसी से कम नहीं रहा। आज दोनों की कसमसाहट साफ़ दिखाई देती है। राज्यों में बैठे भाजपा के जिन मुख्यमंत्रियों के इशारे मोदी-युग से पहले हुक़्मनामा हुआ करते थे, आज जब वे भी निवेदक बने घूम रहे हैं तो बाकी मुख्यमंत्रियों की तो बिसात ही क्या? राजस्थान की वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के रमन सिंह का सारा धांसूपन सवा दो साल में तिरोहित हो गया है।
वसुंधरा और शिवराज में जिन्हें एक वक़्त प्रधानमंत्री-तत्व के दर्शन होते थे, उन दोनों को तब्दील होते देख सभी हतप्रभ हैं। ऐसे में गुजरात के विजय रूपानी, महाराष्ट्र के देवेंद्र फडनवीस, हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर, असम के सर्वानंद सोनोवाल, गोवा के लक्ष्मीकांत पार्सेकर और झारखंड के रघुबर दास से तो यूं भी कारकूनी से ज़्यादा की उम्मीद करना ठीक नहीं है।
भाजपा में अब भैरोंसिंह शेखावत जैसे कद्दावर तो रहे नहीं और सुंदरलाल पटवा किसी को अब याद नहीं। गोविंदाचार्य जैसे विचारकों की बहुत पहले विदाई हो गई और सुधींद्र कुलकर्णी से लेकर बलवीर पुंज तक की सूरत अब पहचानी नहीं जाती। नरेंद्र भाई के ‘अनुशासन पर्व’ के इन सवा दो साल में जब उमा भारती का उबाल गंगा में समा गया और स्मृति ईरानी की उमंगें यादों के हवाले हो गईं तो यशवंत सिन्हा या शत्रुध्न सिन्हा ही कौन-सा ऐसा पराक्रम दिखाते कि अपने को हाशिए पर होने से बचा लेते? जब यह हो रहा हो तो भाजपा के कोर-गु्प से निकाल बाहर किए गए रमेश बैस बस्तर के जंगलों में बुक्का फाड़ कर ज़ोर-ज़ोर से रोते भी तो सुनता कौन? उन्होंने अच्छा किया कि आंसू भीतर ही पी लिए। मर्द रोते हुए यूं भी अच्छे नहीं लगते। लेकिन मर्द लाचार भी कब अच्छे लगते हैं? मोदी-युग में भाजपा के लिए क़ुर्बानियां देने वालों को पता नहीं क्या-क्या देखना पड़ेगा!
मध्यप्रदेश में बाबूलाल गौर और सरताज सिंह; बिहार में सी.पी. ठाकुर, अश्विनी चौबे, सुशील कुमार मोदी और कीर्ति आज़ाद; पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू; उत्तर प्रदेश में कलराज मिश्रा और दिल्ली में डॉ. हर्षवर्द्धन जैसे सैकड़ों लोगों का पसीना भाजपा की नींव बनाने में कुछ तो बहा होगा! आज इन सबकी छोटी-मोटी क़ुर्बानी से आंखें चुराने वाले भावी पीढ़ी के त्याग का कैसा स्मारक बनाएंगे–हम समझ सकते हैं। प्रमोद महाजन भले विवादों से घिरे रहते थे, लेकिन गोपीनाथ मुंडे तो निर्विवाद थे। भाजपा के निर्माण में दोनों का अपनी-अपनी तरह का योगदान था। मुझे इस बात की खुशी है कि भाजपा को परिवारवाद की कुरीति से दूर रखने के लिए दोनों की बेटियो–पूनम और पंकजा–को ज़्यादा तरज़ीह नहीं दी जा रही है।
इसी परंपरा में आडवाणी की बेटी प्रतिभा की अनदेखी करने और राजनाथ के बेटे पंकज पर लगाम रखने के लिए भी मैं नरेंद्र भाई को पूरे अंक देता हूं। उप-राष्ट्रपति बनने के लिए उचक रहीं नज़मा हेपतुल्ला को मणिपुर जैसे अदने राज्य का राज्यपाल बना कर भेज देना और केंद्र के मंत्रिमंडल में बैठे बहुत-से मंत्रियों से अपने को ज़्यादा क़ाबिल मानने वाली किरण बेदी की वर्दी पर पुदुचेरी के उप-राज्यपाल की नामपट्टिका चिपका देना कोई आसान काम नहीं है।
प्रधानमंत्री के हमजोली रोज़ कहते हैं कि मोदी शौर नहीं, सिर्फ़ काम करते हैं। मैं भी मानता हूं कि मोदी बिना कहे जो काम कर रहे हैं, वह लाजवाब है। सवा दो साल में उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं को जिन बेड़ियों में कसा, भाजपा के भीतर स्वतंत्र सोच रखने वालों को भी वैसी ही बेड़ियां पहना दी हैं। रोना तो इस बात का है कि इन बेड़ियों की खनक से अब किसी की नींद नहीं टूटती।
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