चंद्रास्वामी तो चले गए, सवाल कहां जाएंगे? – Global India Investigator

चंद्रास्वामी तो चले गए, सवाल कहां जाएंगे?

चंद्रास्वामी 66 की उम्र में चले गए। जब जिंदा थे तो एक वक़्त ऐसा भी था कि राजधानी के कुतुब एनक्लेव के उनके आश्रम में देश-दुनिया के ‘हू इज़ हू’ में दर्ज़ नामों की क़तार लगी रखी रहती थी। लेकिन इस बुधवार को जब निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ तो वे सब नदारद थे, जिनकी लपलपाती जीभों ने कभी-न-कभी चंद्रास्वामी के अनुग्रह का स्वाद चखा था। पर, इसमें मलाल कैसा? चंद्रास्वामी कौन-से सतयुगी थे कि उनके कलियुगी अनुगामियों का रंग कुछ और होता?

चंद्रास्वामी बरसों से ग़ुमनामी की जि़दगी जी रहे थे। दस साल पहले उन्होंने करवट लेने की कोशिश की थी, मगर बात नहीं बनी। वह 2007 के मार्च का आखिरी बुधवार था। चंद्रास्वामी बनारस में दोपहर ढाई बजे केदारघाट के विद्या मठ में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के कमरे में घुस कर सवा तीन बजे बाहर आए। बातचीत का मुद्दा था कि रामेश्वरम के श्रीराम सेतु को कैसे बचाया जाए? अरसे बाद चंद्रास्वामी को फिर चौधराहट करने का बहाना मिला गया था। उन्होंने ऐलान किया कि अब से उनका तन-मन-धन श्रीराम सेतु की रक्षा के लिए अर्पित है। ऐलान, ऐलान ही रहा।

मैं चंद्रास्वामी से कोई चौथाई सदी पहले सिर्फ एक बार मिला था। दिल्ली से मुंबई जा रही उड़ान के दौरान चंद्रास्वामी के एक नजदीकी पत्रकार ने मेरा परिचय उनसे कराया था। चंद्रास्वामी उस जमाने में आसमान पर उड़ रहे थे और उनकी निग़ाहों का प्रसाद पाने को आतुर लोगों में झूमा-झटकी होती रहती थी। उन्होंने मुझ से भी किसी दिन अपने आश्रम आने को कहा, लेकिन मुझे उनके पास जाने की कभी इच्छा नहीं हुई। दूर से मगर मैं लगातार उनका अध्ययन करता रहा हूं। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान जिन्होंने चंद्रास्वामी की भूमिका पर गहराई से निगाह रखी होगी, वे जानते होंगे कि सफेद-भगवा वस्त्रों से लिपटी इस काया की खोपड़ी किस कदर राजनीति के कारोबार में पगी हुई थी। चंद्रास्वामी की समर्थक शक्तियां भले ही बाद में वैसी मजबूत नहीं रहीं; भले ही देश में ऐसा प्रधानमंत्री नहीं रहा, जिसके घर में उनकी कार बेरोक-टोक कभी भी घुस जाती थी और भले ही चंद्रास्वामी का अंतरराष्ट्रीय जलवा भी गुज़रे ज़माने की बात हो गई थी, मगर मौका मिलते ही गुलाटी खाने का जज्बा चंद्रास्वामी में आख़ीर तक बरकरार रहा।

मैं नहीं जानता कि चंद्रास्वामी ने राजीव गांधी की हत्या के लिए इस्राइल के एक भाड़े के हत्यारे को दस लाख डॉलर देने की पेशकश की थी या नहीं? मैं नहीं जानता कि हैरॉड्स पर कब्जे को ले कर जब मुहम्मद अल फ़याद और टोनी रॉलैंड के बीच तलवारें खिंची हुई थीं तो चंद्रास्वामी ने रॉलैंड को कैसे काबू किया था? मुझे यह भी नहीं मालूम कि तब चंद्रास्वामी ने रॉलैंड से अपनी बातचीत टेप कर उन्हें तब के बेहद बदनाम बैंक बीसीसीएल की मोंटे कार्लो शाखा के लॉकर में छुपा कर रखा था या नहीं? मुझे यह भी पता नहीं कि बोफ़ोर्स कंपनी के मुखिया मॉर्टिन आर्डबो से मिल कर चंद्रास्वामी ने उनसे यह कहा था या नहीं कि वे उन्हें ब्रुरनेई का सलाहकार बनवा सकते हैं और इसके बदले में चंद्रास्वामी आर्डबो से क्या चाहते थे? मैं यह भी नहीं कह सकता हूं कि दो दशक पहले ज्ञानी जैल सिंह को दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए चंद्रास्वामी ने उन्हें चालीस करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव रखा था या नहीं? मैं यह भी नहीं जानता कि नागार्जुन सागर स्रेयाप आयर्न स्केंडल में चंद्रास्वामी को महज 23 साल की उम्र में ही न्यायिक हिरासत में भेजा गया था या नहीं?

पामुलपर्ति वेंकट नरसिंह राव राजनीति में कितने बड़े संत थे, ये बाकी संत जानते होंगे। मैं तो इतना जानता हूं कि चंद्रास्वामी जैसे संत से उन दिनों नरसिंह राव को खासी ताकत मिलती थी और चंद्रास्वामी की सबसे बड़ी ताकत नरसिंह राव थे। राजस्थान के अलवर जिले के बहरोड़ गांव से चल कर नेमिचंद्र जैन कोई यूं ही चंद्रास्वामी नहीं बन गए। उनका परिवार आंध्र प्रदेश जा कर न बस गया होता और वहां नरसिंह राव से नेमिचंद का संपर्क न हुआ होता तो वे भी लाखों जटाधारियों की तरह रेलवे के किसी प्लेटफॉर्म पर पड़े होते। इसलिए चंद्रास्वामी का यह चमत्कार तो आपको मानना ही पड़ेगा कि ललित नारायण मिश्र, यशपाल कपूर, चरण सिंह, राजनारायण, जगजीवनराम, नानाजी देशमुख और देवीलाल तक कौन था, जिससे उन्होंने कभी-न-कभी अपनी शागिर्दी न कराई हो। एक जमाना था कि कुर्सी पाने के लिए और अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश भर से अपने हवाई जहाज ले कर राजनेता चंद्रास्वामी के आश्रम में पहुंचते थे और हाथ जोड़े कतार में खड़े रहते थे।

चंद्रास्वामी चौथाई दशक पहले जब लंदन जाते थे तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉन मेजर उनसे मिलने को उत्सुक रहा करते थे और श्रीचंद हिंदूजा से ले कर सरोश जरीवाला तक बिचौलिए की भूमिका अदा करते थे। मार्गरेट थैचर तो उनकी मुरीद थीं ही। दिनेश पांड्या जैसे किसी हीरा व्यवसायी के निजी निमंत्रण पर अगर चंद्रास्वामी बैंकाक पहुंच जाते थे तो थाइलैंड की सरकार के बड़े-बड़े मंत्री उनकी अगवानी के लिए विमानतल पहुंचने की होड़ लगाया करते थे। तब किसी सोमचाई चाईश्री चावला के लिए यह हिम्मत करना महंगा पड़ जाता था कि वह चंद्रास्वामी को विश्वास में लिए बगैर कर्नाटक की सरकार के साथ दस अरब रुपए के सौदे का सहमति पत्र हासिल कर ले। हॉलिवुड तारिकाओं को अपने इर्द-गिर्द नचाने का हुनर भी चंद्रास्वामी के ही पास था।

मैंने वह वक्त नजदीक से देखा है, जब हमेशा हिम्मत से सराबोर रहने वाले राजेश पायलट ने चंद्रास्वामी को गिरफ्तार करने के निर्देश सीबीआई को दे दिए थे। नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। पायलट उनके आंतरिक सुरक्षा मंत्री थे। उन दिनों कानपुर की जेल में बंद बबलू श्रीवास्तव ने रहस्य उजागर किया था कि चंद्रास्वामी के दाऊद इब्राहीम से रिश्ते हैं। मुंबई में दाऊद के कराए बम विस्फोटों के बारूद की बदबू हवा में बाकी थी। बबलू का कहना था कि दीवान भाइयों–विपिन और संदीप–ने चंद्रास्वामी को दुबई में दाऊद से मिलवाया था और बाद में दाऊद ने ही चंद्रास्वामी को दुनिया के सबसे बड़े हथियार सौदागर अदनान खाशोगी से मिलवाया। 1995 के सितंबर महीने में चंद्रास्वामी की गिरफ्तारी के हुक़्म ने उनके सबसे बड़े खैरख्वाह नरसिंह राव को परेशान कर दिया था। चंद्रास्वामी अपने आश्रम में भीतर से सहमे और ऊपर से उबलते बैठे थे। मिलने वालों की कतार गायब थी। सितंबर के दूसरे सप्ताह के उस सूने शुक्रवार को नरसिंहराव का सिर्फ एक मंत्री चुपचाप चंद्रास्वामी से मिलने उनके आश्रम पहुंचा और शाम होते-होते पायलट की गृह मंत्रालय से विदाई हो गई। उन्हें पर्यावरण मंत्रालय में भेज दिया गया। यह थी हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संत-महात्माओं को सताने की सज़ा।

तीन दशक से भी ज्यादा वक़्त से हवा में तैर रहे कई सवाल आज भी जिंदा हैं। सवाल है कि अदनान खाशोगी से चंद्रास्वामी की दोस्ती कैसे हुई थी? खाशोगी जब दिल्ली आए तो चंद्रास्वामी के आश्रम में उनसे कौन-कौन मिलने गए थे? ब्रुनेई के सुल्तान से चंद्रास्वामी की ऐसी गहरी दोस्ती का राज़ क्या था? पामेला बोर्डेस किस्से की असली सच्चाई क्या थी? भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली तब की केंद्र सरकार में चंद्रास्वामी के किस-किस से क्या संबंध थे? इन तमाम सवालों के कुहासे में घिरे चंद्रास्वामी तो अलविदा कह गए। लेकिन अपने पीछे सवालों की दौलत का जो ज़खीरा वे छोड़ गए है, उनके जवाबों का खजाना जब भी सामने आएगा, बड़े-बड़ों की आंखें चुंधिया जाएंगी। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)


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